High Court Order जयपुर । राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि, आपसी लेनदेन, जमीन-जायदाद और कॉमर्शियल विवाद जैसे ‘सिविल नेचर’ के मामलों में पुलिस सीधे FIR दर्ज नहीं कर सकती। जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की बेंच ने डीजीपी (राजीव कुमार शर्मा) को आदेश दिए हैं कि, वे पूरे प्रदेश में इस संबंध में नए और कड़े निर्देश जारी करें ताकि आम जनता को पुलिसिया उत्पीड़न से बचाया जा सके। Rajasthan High Court DGP Order
क्यों भड़का हाईकोर्ट? डीजीपी के सर्कुलर की उड़ी धज्जियां
अदालत ने यह सख्त रुख टोंक जिले के निवाई थाने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अपनाया। दरअसल, वहां पुलिस ने दो व्यापारियों के बीच 18 लाख रुपये के लेनदेन (कमर्शियल विवाद) को ‘आपराधिक’ रंग देते हुए एफआईआर दर्ज कर ली थी।
नियम क्या है? सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों और डीजीपी के 10 जून 2025 के सर्कुलर में साफ कहा गया है कि, सिविल मामलों में एफआईआर नहीं होगी। Police FIR Rules Civil Cases
लापरवाही: इस मामले में पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले एसपी (SP) की लिखित अनुमति तक नहीं ली, जो कि अनिवार्य है।
कोर्ट का एक्शन: हाईकोर्ट ने न केवल आरोपियों की अग्रिम जमानत मंजूर की, बल्कि लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारी की पहचान कर उसके खिलाफ जांच के आदेश भी दिए।
सिविल और क्रिमिनल केस का अंतर समझना जरूरी
अक्सर देखा गया है कि, पैसे के लेनदेन या जमीन के विवाद में एक पक्ष दूसरे पर दबाव बनाने के लिए पुलिस का सहारा लेता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि, Justice Pramil Kumar Mathur Order, Civil Dispute Criminal FIR Rajasthan
आपसी लेनदेन: यदि मामला सिर्फ पैसे के भुगतान का है, तो वह सिविल विवाद है।
जमीन विवाद: जब तक धोखाधड़ी या फर्जी दस्तावेज का पुख्ता सबूत न हो, पुलिस दखल नहीं दे सकती।
कॉमर्शियल एग्रीमेंट: बिजनेस पार्टनर के बीच का विवाद कोर्ट (सिविल) तय करेगा, थाना नहीं।
अदालत की टिप्पणी: “जब तक किसी मामले में साफ तौर पर कोई अपराध नहीं बनता, उसे आपराधिक रंग देकर एफआईआर दर्ज करना कानून का उल्लंघन है।”