Ahar Civilization History जयपुर । प्राचीन धातुकर्म और ऐतिहासिक इंजीनियरिंग की जब भी बात आती है, तो दुनिया के वैज्ञानिक अक्सर मेसोपोटामिया या मिस्र की मिसाल देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि, आज से ठीक 4000 साल पहले राजस्थान में एक ऐसी रहस्यमयी सभ्यता मौजूद थी, जिसके कारीगरों के पास तांबा गलाने की ऐसी महारत थी, जिसे देखकर आज के आधुनिक वैज्ञानिक और धातुकर्म विशेषज्ञ भी अपने दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं? Ahar Civilization Rajasthan History, Tamravati Nagari Udaipur, Banas Culture Ahar Excavation, Banassian Bull Reverse Firing Pottery, Today History Ahar Civilization
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दरअसल, हम बात कर रहे हैं, आहाड़ सभ्यता (Ahar Civilization) की, जिसे इतिहास के पन्नों में ‘ताम्रवती नगरी’ और ‘बनास संस्कृति’ (Banas Culture) के नाम से जाना जाता है। कार्बन डेटिंग (C-14) प्रणाली के अनुसार ईसा पूर्व 2000 से 1200 ईसा पूर्व (लगभग 4000 वर्ष पूर्व) के बीच पनपी यह सभ्यता केवल मिट्टी के बर्तन बनाने तक सीमित नहीं थी। यहां घर-घर में तांबा पिघलाने की भट्टियां धधकती थीं और यहां की निर्मित तांबे की कुल्हाड़ियां, औजार तथा सिक्के यूनान तक पहुंचते थे। आइए, इस ऐतिहासिक सभ्यता के उस पूरे सच का गहराई से विश्लेषण करते हैं, जिसने भारत को प्राचीन काल में धातुकर्म का ‘ग्लोबल हब’ बनाया था।
आहाड़ सभ्यता का भौगोलिक व ऐतिहासिक वजूद
राजस्थान के मेवाड़ अंचल में वर्तमान उदयपुर शहर के पास से गुजरने वाली आयड़ (आहाड़) नदी के तट पर यह समृद्ध संस्कृति विकसित हुई थी। यही आयड़ नदी आगे चलकर बेड़च नदी कहलाती है, जो बनास नदी प्रणाली का मुख्य हिस्सा है। इसी कारण इतिहासकार इसे ‘बनास संस्कृति’ के नाम से भी संबोधित करते हैं। इस सभ्यता को कालखंड और इतिहास के हिसाब से तीन प्रमुख प्राचीन नामों से पहचाना जाता है।
- ताम्रवती नगरी: प्राचीन काल में यहां अरावली की खदानों से तांबा निकालकर शुद्ध करने और औजार बनाने का विशाल उद्योग था, जिसके कारण इसे ‘ताम्रवती’ कहा गया।
- अघाटपुर / आघट दुर्ग: 10वीं और 11वीं शताब्दी के ऐतिहासिक ताम्रपत्रों और अभिलेखों में इस पूरे क्षेत्र को ‘अघाटपुर’ के नाम से दर्ज किया गया है।
- धूलकोट: स्थानीय ग्रामीण आहाड़ नदी के किनारे स्थित मिट्टी और प्राचीन मलबे के विशाल टीले को ‘धूलकोट’ यानी धूल का किला कहते हैं।
3 चरणों में हुआ उत्खनन: 8 स्तरों में छिपा है उजड़ने और बसने का राज
आहाड़ का पुरातात्विक उत्खनन किसी एक वैज्ञानिक का काम नहीं था, बल्कि यह तीन अलग-अलग चरणों में भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरातत्वविदों द्वारा पूरा किया गया।
- प्रथम खोज (1953): इस टीले के ऐतिहासिक महत्व को सबसे पहले अक्षय कीर्ति व्यास (A.K. Vyas) ने पहचाना और इसकी प्राथमिक खोज की।
- द्वितीय चरण (1956): इसके बाद रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agrawal) के कुशल मार्गदर्शन में यहां खुदाई का काम आगे बढ़ा।
- विस्तृत उत्खनन (1961-62): आहाड़ का सबसे वैज्ञानिक और विस्तृत उत्खनन पूना विश्वविद्यालय के महान प्रोफेसर हसमुख धीरजलाल सांकलिया (H.D. Sankalia) और वी. एन. मिश्रा ने मेलबर्न विश्वविद्यालय (ऑस्ट्रेलिया) के सहयोग से पूरा किया।
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8 स्तरों का रहस्य…
उत्खनन के दौरान वैज्ञानिकों को यहां कुल 8 स्तर मिले। इससे यह प्रमाणित होता है कि, आहाड़ की यह मानव बस्ती कम से कम 8 बार प्राकृतिक आपदाओं (जैसे नदी की भीषण बाढ़ या महामारी) के कारण नष्ट हुई और हर बार निवासियों ने उसी जगह पर पुनर्गठन करके दोबारा नया शहर बसाया।
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तांबे का वो सच, जिसने वैज्ञानिकों को किया हैरान!
आहाड़ को ‘ताम्रवती नगरी’ क्यों कहा जाता है, इसका सबसे बड़ा सच यहां की खुदाई में मिली तांबा गलाने की भट्टियां-उपकरण हैं।
- तांबा पिघलाने की भट्टी: 4000 साल पहले जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में धातु को पिघलाने का तापमान नियंत्रित करने की तकनीक नहीं थी, तब आहाड़ के लोग बंद भट्टी में उच्च तापमान पैदा करके तांबे के अयस्क से शुद्ध तांबा अलग कर लेते थे।
- तांबे के औजार: खुदाई में तांबे की 6 कुल्हाड़ियां, नालीदार कंगन, अंगूठियां, छेनियां, चाकू और छड़ें मिली हैं। तांबे की धारदार कुल्हाड़ियों की फिनिशिंग इतनी सटीक है कि आधुनिक धातु विशेषज्ञ भी उस दौर के कारीगरों की तकनीकी समझ की दाद देते हैं।
सामाजिक ढांचा और 15 फीट गहरी जल तकनीक…
आहाड़ सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी, लेकिन इसकी नागरिक और घरेलू व्यवस्था बेहद वैज्ञानिक थी।
- संयुक्त परिवार प्रणाली: आहाड़ के मकानों की खुदाई में एक साथ 4 से 6 मिट्टी के चूल्हे मिले हैं। एक बड़े चूल्हे पर इंसान की हथेली की छाप मिली है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि, यहां संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी या फिर पूरे समुदाय के लिए सामूहिक रूप से भोजन पकाया जाता था।
- मकानों का निर्माण: मकान धूप में सुखाई गई ईंटों और पत्थरों से बनाए जाते थे। गारे (मिट्टी) को मजबूत करने के लिए उसमें क्वार्ट्ज पत्थर के टुकड़े और धान की भूसी मिलाई जाती थी। छतें बांस और ‘केलू’ (खपरैल) से बनाई जाती थीं।
- चक्रकूप पद्धति: घरों के गंदे पानी के वैज्ञानिक निपटान के लिए जमीन में 15 से 20 फीट गहरे गड्ढे खोदकर उनमें एक के ऊपर एक मिट्टी का मटका या घड़ा रखा जाता था। पानी मटकों से छनकर जमीन के नीचे सोख लिया जाता था। इस अनूठी जल निकासी तकनीक को ‘चक्रकूप’ कहा जाता था।
अर्थव्यवस्था: कृषि, पशुपालन और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंध
- कृषि व खाद्यान्न: आहाड़ के लोग मुख्य रूप से गेहूं, जौ और चावल की खेती करते थे। अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी के बड़े-बड़े कोठार (मटके) इस्तेमाल होते थे, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘गोरे’ या ‘कोट’ कहा जाता था।
- पशुपालन: गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर का पालन होता था। खुदाई में जली हुई हड्डियां मिलने से पता चलता है कि लोग मांसाहारी भोजन भी करते थे।
- यूनानी देवता ‘अपोलो’ की मुद्राएं: आहाड़ से तांबे की 6 मुद्राएं (Coins) और 3 मोहरें (Seals) मिली हैं। एक मुद्रा पर त्रिशूल अंकित है, जबकि दूसरी तरफ यूनानी देवता अपोलो का चित्र है, जिनके हाथ में तीर और पीठ पर तरकश है। किनारे पर यूनानी भाषा में लेख लिखा है। यह खोज साबित करती है कि, आहाड़ का सीधा व्यापारिक संबंध प्राचीन यूनान और पश्चिमी एशियाई देशों से था।
- बिना हत्थे के जलपात्र: बिना हत्थे वाले छोटे घड़े या जलपात्र मिले हैं, जो ठीक उसी समय ईरान और बलूचिस्तान में इस्तेमाल होते थे।
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कला, उल्टी निभाई मृदभांड और बनासियन बुल
- लाल और काले मृदभांड: आहाड़ के बर्तन अंदर से काले और बाहर से लाल रंग के हैं। इन्हें पकाने के लिए ‘उल्टी निभाई’ पद्धति का इस्तेमाल होता था। इन बर्तनों पर सफेद रंग से कलात्मक रेखाएं और ज्यामितीय बिंदुक बनाए जाते थे।
- बनासियन बुलः पकी हुई मिट्टी से बनी बैल की उत्कृष्ट मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, जिन्हें पुरातत्वविदों ने ‘बनासियन बुल’ नाम दिया है। यह आहाड़ निवासियों के धार्मिक विश्वास और पशुधन के प्रति आदर का प्रतीक था।
- अंतिम संस्कार की परंपरा: मृतकों को वस्त्रों और आभूषणों के साथ दफनाया जाता था। शव का सिर हमेशा उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में रखे जाते थे, जो उनके पारलौकिक जीवन में विश्वास को दर्शाता है।
निष्कर्षः आहाड़ सभ्यता केवल एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि यह इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि, 4000 साल पहले का भारत तकनीकी, वैज्ञानिक और व्यापारिक रूप से कितना आत्मनिर्भर था। बिना किसी आधुनिक लैबोरेटरी के ताबा पिघलाने की कला, चक्रकूप जैसी जल-निकासी तकनीक और यूनान तक फैला व्यापार यह साबित करता है कि, मेवाड़ की यह बनास संस्कृति अपने समय से बहुत आगे थी। आज के वैज्ञानिकों के लिए आहाड़ के अवशेष प्राचीन भारतीय विज्ञान की उस स्वर्णिम विरासत का हिस्सा हैं, जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए।