Kotpuri Buzurg रेवाड़ी । जिला मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर दूर बसा गांव ‘कतोपुरी बुजुर्ग’ अपने करीब 300 वर्ष पुराने समृद्ध इतिहास और बेमिसाल आपसी भाईचारे के लिए क्षेत्र में एक अलग और विशिष्ट पहचान रखता है। Rewari History and Heritage, Haryana Village History, Jatusana Katopuri Rewari, 52 दरवाजों की हवेली रेवाड़ी, कतोपुरी गांव के शहीद
ग्रामीणों के अनुसार गांव का नाम जाटूसाना के कुतुबदिन के नाम पर पड़ा था। बताया जाता है कि, कुतुबदिन ने तत्कालीन जिला महेंद्रगढ़ के गांव झगड़ोली से आए एक परिवार को ज़मीन देकर यहां बसाया था। ग्रामीणों की मानें तो उनके पूर्वज व बुजुर्ग गांव में सबसे पहले एक पेड़ के नीचे आकर बसे थे।
इस ऐतिहासिक घटनाक्रम की खास बात यह है कि, उस दौर का बताया जाने वाला जाटी का पेड़ आज भी गांव में पूरी तरह हरा-भरा खड़ा है, जो गांव के इतिहास का मूक साक्षी है। समय बीतने के साथ ‘कुतुबपुर बुजुर्ग’ का नाम स्थानीय बोलचाल में धीरे-धीरे बदलकर ‘कतोपुरी’ हो गया।
करीब 1500 की कुल आबादी वाले इस गांव में तीन जातियों के लोग वर्षों से पूर्ण आपसी सौहार्द और भाईचारे के साथ निवास करते हैं। गांव में स्थित लगभग 150 वर्ष पुरानी हवेली भी आकर्षण का मुख्य केंद्र है, जिसमें 52 दरवाजे हैं जो पुरानी उत्कृष्ट स्थापत्य विरासत और इतिहास की झलक दिखाते हैं।
देशसेवा में बलिदान, सेना में 40 जवान और प्रशासनिक हस्तियां (Kotpuri Buzurg)
कतोपुरी बुजुर्ग गांव के युवाओं में देशसेवा के प्रति हमेशा से गहरा जज़्बा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार अब तक गांव के करीब 40 युवा भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा में अपनी सेवा दे चुके हैं या वर्तमान में सेवारत हैं। देश की सुरक्षा में गांव के वीरों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी है; जिनमें रामकुमार 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए, जबकि लखमीचंद और नवीन कुमार कुपवाड़ा में देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।