Rakshabandhan-राखी की परंपरा क्यों शुरू हुई? जानिए रक्षाबंधन से श्री कृष्ण और द्रौपदी का संबंध है? 

Rakshabandhan नई दिल्ली । समय की रफ्तार के साथ इतिहास के पन्नों में हर तारीख किसी न किसी बड़े बदलाव की गवाही देती है। 28 अगस्त की तारीख भी देश और दुनिया के इतिहास में एक ऐसा ही बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखती है। आज ही के दिन भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन का त्योहार मुख्य रूप से मनाया गया था। यह पर्व केवल एक साधारण रेशमी धागे का त्योहार नहीं है, बल्कि रक्षा के पवित्र वचन का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत वेदों और पौराणिक कथाओं से मानी जाती है। Rakshabandhan History, Draupadi Krishna Festival History, News Voice India

द्रौपदी का पल्लू बना रेशमी धागा

पौराणिक कथाओं में रक्षाबंधन का सबसे रोचक संदर्भ महाभारत काल से मिलता है। मान्यता है कि, एक बार भगवान श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी और खून बहने लगा था। यह देखकर वहां मौजूद द्रौपदी ने बिना कुछ सोचे अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। द्रौपदी के इस निःस्वार्थ स्नेह से श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए थे। उन्होंने द्रौपदी को रक्षा का वचन दिया था। आगे चलकर जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब श्रीकृष्ण ने अपना वही वचन निभाया और कौरवों की सभा में द्रौपदी की लाज बचाई। द्रौपदी का साड़ी का पल्लू ही आगे चलकर राखी के रेशमी धागे के रूप में पहचाना जाने लगा।

जब इंद्र की पत्नी ने बांधा था रक्षासूत्र

रक्षाबंधन से जुड़ी एक और दिलचस्प कथा भविष्य पुराण में मिलती है। इसके अनुसार एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में असुर भारी पड़ रहे थे और देवराज इंद्र हारने के कगार पर थे। तब गुरु बृहस्पति ने इंद्र की रक्षा के लिए उनकी पत्नी शचि को एक विशेष सलाह दी। गुरु बृहस्पति की सलाह पर शचि ने श्रावण पूर्णिमा के दिन एक रेशमी रक्षासूत्र तैयार किया और उसे अपने पति इंद्र की कलाई पर बांधा। इस रक्षासूत्र की शक्ति से इंद्र को युद्ध में विजय मिली। प्राचीन काल में यह केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं था बल्कि रक्षा का एक सूत्र था।

यमराज और यमुना की कहानी

एक अन्य प्राचीन कथा यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी है। कहा जाता है कि, यमुना ने अपने भाई यमराज को राखी बांधी थी। यमुना के इस स्नेह से यमराज बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने यमुना को अमरता और सुरक्षा का वरदान दिया था।

वैदिक काल में धागे नहीं स्वर्ण और रत्न

वेदों में रक्षाबंधन के बारे में बताया गया है कि यह पर्व प्राचीन काल से ही रक्षा और सुरक्षा का प्रतीक रहा है। उस समय रक्षासूत्र केवल साधारण रेशमी धागे नहीं होते थे। वैदिक काल में ऋषि-मुनि अपने राजाओं और यजमानों को रक्षा के लिए कलावे के साथ-साथ स्वर्ण, मणि और विशेष औषधियों से तैयार रक्षासूत्र बांधते थे।

त्योहार का मूल उद्देश्य…

  • बहन की कामना: बहनें अपने भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना के लिए राखी बांधती हैं।
  • भाई का संकल्प: भाई अपनी बहन को हर परिस्थिति में सुरक्षित रखने का संकल्प लेते हैं।
  • पारिवारिक जुड़ाव: यह पर्व परिवार के सदस्यों को एक साथ जोड़ता है और आपसी रिश्तों को मजबूत करता है।

पहले और अब में क्या बदलाव आया?

पहले का पारंपरिक रूप: प्राचीन समय में परिवार एक ही जगह रहते थे। सभी भाई-बहन मिलकर पारंपरिक तरीके से पूजा, तिलक और आरती करते थे।

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