Jallianwala Bagh Hatyakand: 106 साल पहले का वो घाव, जिसकी टीस आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में है…

 Jallianwala Bagh Hatyakand चंडीगढ़ । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 13 अप्रैल 1919 की तारीख एक ऐसी काली याद है, जिसे याद करके आज भी रूह कांप जाती है। (aaj kya hai google) अमृतसर का वो छोटा सा बाग, जहां बैसाखी के दिन खुशियां मनाई जानी थीं, अचानक चीख-पुकार और मौत के मातम में बदल गया। (aaj kya din hai) आखिर क्या हुआ था, उस दिन? क्यों एक अंग्रेज अफसर इतना अंधा हो गया कि, उसने निहत्थे मासूमों पर गोलियां बरसा दीं? आज का दिन विशेष क्या है। आइए, इतिहास की उस परत को खोलते हैं, जो हमें हमारी आजादी की असल कीमत बताती है। Jallianwala Bagh Massacre History

साजिश का जाल: आखिर क्यों इकट्ठा हुए थे लोग? 13 April 1919 Amritsar

बात उन दिनों की है, जब प्रथम विश्व युद्ध खत्म हुआ था। भारतीयों को लगा था कि, अंग्रेज अब उन्हें थोड़ी आजादी देंगे, लेकिन बदले में मिला ‘रोलेट एक्ट’। इस कानून का मतलब था, बिना किसी दलील और वकील के किसी को भी जेल में डाल देना।

पंजाब के दो बड़े क्रांतिकारी नेताओं, डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल को बैसाखी वाले दिन जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा बुलाई गई थी। बाग में हजारों की भीड़ थी, जिसमें शहर से आए प्रदर्शनकारी ही नहीं, बल्कि पास के गांवों से आए किसान, महिलाएं और छोटे बच्चे भी थे, जो सिर्फ बैसाखी का मेला देखने अमृतसर आए थे।

10 मिनट, 1650 राउंड और बिछ गई लाशों की ढेर

शाम के करीब 4:30 बज रहे थे। अचानक ‘जनरल डायर’ अपने 90 सशस्त्र सैनिकों के साथ बाग के एकमात्र संकरे प्रवेश द्वार पर आ खड़ा हुआ। उसने न तो कोई चेतावनी दी और न ही भीड़ को हटने का मौका दिया। उसने बस एक ही हुक्म दिया, फायर!”

अगले 10 मिनट तक जो हुआ, उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। चारों तरफ ऊंची दीवारें थीं और निकलने का रास्ता डायर ने ब्लॉक कर रखा था। गोलियां तब तक चलती रहीं जब तक कि सैनिकों का कारतूस खत्म नहीं हो गया। कुल 1650 राउंड गोलियां चलीं। लोग अपनी जान बचाने के लिए वहां मौजूद एक कुएं में कूदने लगे। देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया। सरकारी आंकड़ों ने संख्या छिपाई, लेकिन सच यह है कि उस दिन हजारों घरों के चिराग बुझ गए थे।

जनरल डायर की वो सनक और उधम सिंह का ‘महा-संकल्प’

इस कत्लेआम के बाद जब डायर से पूछा गया कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसका जवाब था, “मैं भारतीयों के मन में एक ऐसा डर पैदा करना चाहता था कि वे कभी अंग्रेजों के खिलाफ सिर न उठा सकें।”

लेकिन डायर की यह सनक उसे भारी पड़ी। उस बाग की मिट्टी में एक मासूम बच्चा भी मौजूद था, जिसका नाम था उधम सिंह। उसने उस दिन खून से सनी मिट्टी हाथ में लेकर शपथ ली थी कि वह इस अपमान का बदला लेगा। ठीक 21 साल बाद, 1940 में उधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में जाकर उस खूनी खेल के असली मास्टरमाइंड माइकल ओ’डायर को गोली मार दी।

क्यों खास है जलियांवाला बाग?

जलियांवाला बाग कांड केवल एक हत्याकांड नहीं था, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की शुरुआत थी। इस घटना के बाद महात्मा गांधी ने अपना पहला बड़ा आंदोलन ‘असहयोग आंदोलन’ शुरू किया और पूरे देश ने एक स्वर में अंग्रेजों को भारत छोड़ने की चेतावनी दे दी।

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